गुरुपौर्णिमा गुरुपौर्णिमा की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ !!! मैंने यह कविता 2015 के गुरुपौर्णिमा के अवसर पर अपने बेटे नहुष के गुरुओं के लिए लिखी थी l गुरू हमारे मातापिता होते हैं हमारे गुरू और गुरू होते हैं हमारे शिक्षक इनके बिना अधूरा है हमारी जिंदगी का कथानक l जब छोटे थे तब, माँ बनी पहली गुरू l जिंदगी में कठिनाइयां आनी हुईं शुरु, तो पिताजी बने गुरू l स्कूल और कॉलेज में मिले, शिक्षक के रूप में गुरू l ईन सबके के कारण जिंदगी की नाव, सुरक्षित तैरना हुई शुरु l इतना ही नहीं तो, संगीत और खेल के मैदान में भी मिले गुरू l यह सब बने खेवट, मेरी जिंदगी की नाव के l मैंने भी कर दी, अपनी नाव हवाले इनके l इनके बताये हुए रास्ते पर, चलने की है मैंने ठानी l नहीं करूँगा इनके आगे, कभी अपनी मनमानी l गुरुपूर्णिमा के इस पावन अवसर पर अपने सारे गुरुओं को मैं तहे दिल से याद करता हूँ और आप सभी के चरणों में अपना सादर प्रणाम करता हूँ l🙏🙏 - वैशाली
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